Friday, September 18, 2015

अगर अपनाएं उचित समाधान तो बचे रहेंगे खेत-खलिहान

यह हमारा मायूसीभरा दौर है। ऐसा प्रतीत होता है कि इस साल ईश्वर भारतीय किसानों पर सबसे ज्यादा कुपित रहे हैं। साल की शुरुआत में अजीबोगरीब मौसमी हालात बने, ओलावृष्टिï और बेमौसम बारिश ने खेतों में तैयार फसल को बरबाद कर दिया। किसी को अंदाजा नहीं कि क्या हो रहा था। हर साल हमारा सामना 'पश्चिमी विक्षोभ' नाम की मौसमी परिघटना से होता है, जिसमें भूमध्य सागर से चलने वाली हवाएं भारत के पूर्वी हिस्से तक बहती हैं। इस साल नई बात यही थी कि इसकी 'तीव्रता' बहुत ज्यादा थी, जिसके चलते बहुत जोरों से बेमौसम बारिश हुई। इससे भी महत्त्वपूर्ण यह कि अमूमन हिमालय के ऊपर 'टूटने' के बजाय इस विक्षोभ की हवाएं नमी के साथ बंगाल और यहां तक कि दक्षिण में मध्य प्रदेश के ऊपर तक पहुंच गईं। मौसम विज्ञानी इसकी पहेली में उलझकर रह गए। 

दूसरी ओर किसान अपनी आंखों के सामने लहलहाती फसल को बरबाद होते देखने पर मजबूर थे। उनका दर्द साफ तौर पर महसूस किया जा सकता था। हालात का जायजा लेने के लिए ग्रामीण उत्तर प्रदेश गए मेरे सहकर्मी, वहां से तमाम कारुणिक कहानियों के साथ लौटे। किसान खेती की बढ़ती लागत के साथ पहले ही कर्ज के भंवर में फंसे हुए हैं और अब उन पर यह आपदा आ पड़ी। यह किसी वज्रपात से कम नहीं था।  

मगर यह तो महज साल की शुरुआत थी, जब पहली फसल का सत्र चल रहा था। फिर सूखे की आशंका के खतरे की घंटी बजी, जिसका ताल्लुक अल नीनो से है। अल नीनो प्रशांत महासागर के गरम होने से उपजने वाला एक मौसमी परिवर्तन है, जो मॉनसून की हालत पस्त कर देता है। देश के कई इलाकों में यह मॉनसून के दगा देने वाला लगातार दूसरा, तीसरा या यहां तक कि चौथा साल रहा। यह खतरनाक स्थिति है, जहां देश के कई इलाकों में फसलों, मवेशियों और पेयजल के लिए पानी ही उपलब्ध नहीं। अहम सवाल यही है कि क्या यह जल्द खत्म हो जाएगा या फिर यह सिर्फ शुरुआत भर है कि भविष्य की तस्वीर कैसी दिखने वाली है? इस प्रश्न का जवाब एक तरह से जीवन और मौत का सवाल है। 

अगर हम मौसम की मायूसी को नुकसान वाले साल का हाल समझकर नजरअंदाज कर भी दें तो हम कभी उन सुधारों को अमल में नहीं ला पा पाएंगे, जिनकी भविष्य को देखते हुए बहुत शिद्दत से दरकार है क्योंकि भविष्य और ज्यादा जोखिमभरा और हमें अधिक संवेदनशील बनाता नजर आ रहा है। मौसम विज्ञानी आपको बताएंगे कि मौसम ज्यादा तुनकमिजाज होता जा रहा है, ज्यादा उलझाऊ और निश्चित रूप से ज्यादा विध्वंसक। यहां तक कि अगर वे 'जलवायु' शब्द के इस्तेमाल को लेकर हिचकते हैं, मगर इस बात पर सहमत हैं कि कुछ नया सक्रिय हो रहा है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह एक सामान्य मौसमी भिन्नता है लेकिन इसमें दीर्घावधिक परिवर्तन करने का माद्दा है। ऐसे में हम क्या कर रहे हैं? 

पहला तो यही कि हमें मौसम विज्ञानों के लिए अधिक से अधिक संसाधन झोंकने होंगे। इसी में हमारे भविष्य की सुरक्षा निहित है।  हमें मॉनसून और मौसम अनुमान के विज्ञान में निवेश बढ़ाने की जरूरत है। पिछले बजट में सभी वैज्ञानिक मंत्रालयों के लिए आवंटित धन में कटौती की गई थी। इसका अर्थ यही है कि पुणे स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मीटिरियोलॉजी जैसे मॉनसून के अध्ययन में लगे संस्थानों के सालाना बजट में 25 से 30 फीसदी की सालाना कटौती हो सकती है। हमें इस जीवनरेखा विज्ञान पर कम नहीं बल्कि और अधिक खर्च करने की जरूरत है। 

दूसरी बात कि हमें अपने कृषि संकट के समाधान के लिए अधिक प्रयास करने की आवश्यकता है। यह स्पष्टï है कि किसान दो पाटों के बीच फंसे हुए हैं। एक ओर तो आगम लागतें, विशेषकर श्रम और पानी का खर्च लगातार बढ़ रहा है, दूसरी ओर खाद्य कीमतें नियंत्रण के दायरे में हैं। हमारी खाद्य मूल्य नीति इस धारणा पर आधारित है कि हम एक गरीब देश हैं, इसलिए उपभोक्ताओं के हित अवश्य ही सुरक्षित रखे जाने चाहिए। मगर इसका अर्थ यही है कि किसान, जो खाद्य उपभोक्ता भी हैं, उन्हें उनके उत्पादों की उचित कीमत नहीं मिल पा रही है। 

वहीं विनियंत्रण और कारोबार को सुगम बनाने को लेकर बड़ी बड़ी बातें कभी उनके खेतों पर केंद्रित नहीं हो पातीं। वे अपने उत्पाद कहां बेच सकते हैं, इस पर भी प्रतिबंध हैं, कीमतें भी कृत्रिम रूप से 'नियत' रखी जाती हैं और जब भी किसी वस्तु की किल्लत होती है तो सरकार भारी सब्सिडी से संचालित वैश्विक फर्मों से बड़े पैमाने पर खरीद कर लेती है। यह सिलसिला जारी नहीं रखा जा सकता। 

तीसरी बात यही कि हमें इन तथ्यों को मद्देनजर रखते हुए विकास की की योजना बनानी होगी कि मौसम में और भिन्नता आएगी और उसके प्रभाव और ज्यादा पड़ेंगे। हमें सभी उपलब्ध विकल्प आजमाने होंगे। इसमें कोई अनोखा विज्ञान नहीं है। इसके लिए जल और निकासी अवसंरचना स्थापित करनी होगी, जिसमें दोनों खूबियां होनी चाहिए कि वह वर्षा के अतिरेक जल का भंडारण कर सके और वर्षा न होने की स्थिति में भूमिगत जल के स्तर को बढ़ा सके। पिछले बजट में सरकार ने सिंचाई में निवेश को भी घटा दिया। हम जल सुरक्षा का ढांचा तैयार करने में ग्रामीण रोजगार की पूरी संभावनाओं का दोहन भी नहीं कर पा रहे हैं। हम अभी तक यह समझ नहीं पाए हैं कि जलवायु जोखिम वाले भारत में जल को लेकर हमें जुनूनी होना होगा। शहरों से लेकर सड़कों तक और बंदरगाहों से लेकर बांधों तक अवसंरचना विकास की प्रत्येक कवायद इस तरह से अंजाम दी जाए कि उसमें पर्यावरण मानकों का पूरा खयाल रखा जाए। 

चौथे कदम के तौर पर हमें किसानों के नुकसान का आकलन और उसकी भरपाई का उचित और त्वरित तरीका तलाशना होगा। फिलहाल हमारी तथाकथित किसान बीमा योजना खराब ढंग से बनाई गई और उसका कार्यान्वयन भी ठीक नहीं है। हमें हवा का रुख भांपना होगा, तभी हम इन मरते खेतों को बचा सकते हैं। 

SOURCE - business-standard.

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